राजस्थान राज्य का निर्माण एवं एकीकरण के चरण

– 1. राजस्थान राज्य का निर्माण एवं एकीकरण के चरण

👉 पहला चरण (‘मत्स्य यूनियन’) 18 मार्च 1948:  सबसे पहले अलवर, भरतपुर, धौलपुर, व करौली नामक देशी रियासतों का विलय कर तत्कालीन भारत सरकार ने  1948 मे अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल कर ‘मत्स्य यूनियन’ के नाम से पहला संघ बनाया। 18

मार्च 1948 को मत्स्य संघ का उद़घाटन हुआ और धौलपुर के तत्कालीन महाराजा उदयभानसिंह को राजप्रमुख, महाराजा करोली को उपराज प्रमुख और अलवर प्रजामंडल के प्रमुख नेता श्री शोभाराम कुमावत को मत्स्य संघ का प्रधानमंत्री बनाया गया।  इसकी राजधानी

अलवर रखी गयी थी।

दूसरा चरण (‘राजस्थान संघ’) 25 मार्च 1948: राजस्थान के एकीकरण का दूसरा चरण 25  मार्च 1948 को स्वतंत्र देशी रियासतों कोटा, बूंदी, झालावाड, टौंक, डूंगरपुर, बांसवाडा, प्रतापगढ, किशनगढ और शाहपुरा को मिलाकर बने ‘राजस्थान संघ’ के बाद पूरा हुआ।

राजस्थान संघ में विलय हुई रियासतों में कोटा बड़ी रियासत थी, इस कारण इसके तत्कालीन महाराजा महाराव भीमसिंह को राजप्रमुख बनाया गया।

👉 तीसरा चरण (‘संयुक्त राजस्थान’)18 अप्रैल 1948: राजस्थान संघ में उदयपुर रियासत का विलय कर ‘संयुक्त राजस्थान’ का निर्माण हुआ | पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा इसका उद्घाटन किया गया | महाराणा मेवाड –भूपालसिंह राजप्रमुख व् माणिक्यलाल वर्मा

प्रधानमंत्री बने | उदयपुर को इस नए राज्य की राजधानी बनाया गया | कोटा महाराव भीमसिंह को उपराजप्रमुख बनाया गया |

👉 –  चौथा चरण (‘वृहत राजस्थान”) 30 मार्च 1949: 30 मार्च, 1949 में जोधपुर, जयपुर, जैसलमेर और बीकानेर रियासतों का विलय होकर ‘वृहत्तर राजस्थान संघ’ बना था। यही राजस्थान की स्थापना का दिन माना जाता है। देशी रियासतों जोधपुर, जयपुर,

जैसलमेर और बीकानेर का विलय करवाकर तत्कालीन भारत सरकार ने 30  मार्च 1949 को वृहत्तर राजस्थान संघ का निर्माण किया, जिसका उदघाटन भारत सरकार के तत्कालीन रियासती और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया।  हालांकि अभी तक चार देशी

रियासतो का विलय होना बाकी था, मगर इस विलय को इतना महत्व नहीं दिया जाता, क्योंकि जो रियासते बची थी वे पहले चरण में ही ‘मत्स्य संघ’ के नाम से स्वतंत्र भारत में विलय हो चुकी थी। जयपुर महाराज सवाईमानसिंह को आजीवन राजप्रमुख, उदयपुर महाराणा

भूपालसिंह को महाराज प्रमुख, कोटा के महाराज श्री भीमसिंह को उपराजप्रमुख व श्री हीरालाल शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया गया | श्री पी. सत्यनारायण राव की अध्यक्षता में गठित कमेठी की की सिफारिशों पर जयपुर को राजस्थान की राजधानी घोषित किया गया | हाई

कोर्ट जोधपुर में, शिक्षा विभाग बीकानेर में, खनिज और कस्टम व् एक्साइज विभाग उदयपुर में, वन और सहकारी विभाग कोटा में एवँ कृषि विभाग भरतपुर में रखते का निर्णय किया गया|

👉 पांचवा चरण (‘वृहत संयुक्त राजस्थान’) 15 अप्रैल 1949: 15 अप्रेल 1949 को भारत सरकार ने शंकरराव देव समिति की सिफारिश को ध्यान में रखते हुए मत्स्य संघ को वृहत राजस्थान में मिला दिया | भारत सरकार ने 18 मार्च 1948 को जब मत्स्य संघ बनाया

था तभी विलय पत्र में लिख दिया गया था कि बाद में इस संघ का राजस्थान में विलय कर दिया जाएगा। इस कारण भी यह चरण औपचारिकता मात्र माना गया। भारत सरकार ने शंकरराव देव समिति की सिफारिश को ध्यान में रखते हुए मत्स्य संघ को वृहत

राजस्थान में मिला दिया | वहां के प्रधानमंत्री श्री शोभाराम को शास्त्

-👉  छठा चरण ‘राजस्थान संघ’ 26 जनवरी 1950:  भारत का संविधान लागू होने के दिन 26 जनवरी 1950 को सिरोही रियासत का भी विलय ग्रेटर राजस्थान में कर दिया गया। इस विलय को भी औपचारिकता माना जाता है क्योंकि यहां भी भारत सरकार का

नियंत्रण पहले से ही था। दरअसल जब राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया चल रही थी, तब सिरोही रियासत के शासक नाबालिग थे।  सिरोही रियासत के एक हिस्से आबू देलवाडा को लेकर विवाद के कारण इस चरण में आबू व् देलवाडा तहसीलों को बम्बई प्रान्त और शेष

भाग को राजस्थान में मिलाने का फेसला लिया गया |  लेकिन आबू और देलवाडा को बम्बई प्रान्त में मिलाने के कारण राजस्थान वासियों में व्यापक प्रतिक्रिया हुई | जिससे 6 वर्ष बाद राज्यों के पुनर्गठन के समय इन्हे वापस राजस्थान को देना पड़ा | 26 जनवरी,1950

को भारत के संविधान लागु होने पर राजपुताना के इस भू-भाग को विधिवत ‘राजस्थान’ नाम दिया गया |

👉 सांतवा चरण (‘वर्तमान राजस्थान’) 1 नवंबर 1956: राज्य पुनर्गठन आयोग (श्री फजल अली की अध्यक्षता में गठित) की सिफारिशों के अनुसार सिरोही की आबू व् दिलवाडा तहसीलें, मध्यप्रदेश के मंदसोर जिले की मानपुरा तहसील का सुनेर टप्पा व अजमेर

–मेरवाडा क्षेत्र राजस्थान में मिला दिया गया तथा राज्य के झालावाड जिले का सिरोंज क्षेत्र मध्यप्रदेश में मिला दिया गया |इस प्रकार विभिन्न चरणों से गुजरते हुए राजस्थान निर्माण की प्रक्रिया 1 नवम्बर, 1956 को पूर्ण हुई और इसी के साथ आज से राजस्थान का

निर्माण या एकीकरण पूरा हुआ।  भारत सरकार के तत्कालीन देशी रियासत और गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी. पी. मेनन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इनकी सूझबूझ से ही राजस्थान के वर्तमान स्वरुप का निर्माण हो सका।

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम और प्रजामंडल आंदोलन

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम और प्रजामंडल आंदोलन

प्रजामंडल का अर्थ

राजस्थान में जन जागृति पैदा कर रियासती कुशासन को समाप्त करने उस में व्याप्त बुराइयोंको दूर करने और नागरिकों को उनके मौलिक अधिकार दिलवाने की लड़ाई वाले राजस्थान संगठनों को प्रजामंडल कहा जाता है

अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद के प्रांतीय इकाईद्वारा चलाए गए आंदोलन प्रजा मंडल/प्रजा परिषद/लोक परिषद आंदोलनों के नाम से जाने जाते हैं

प्रजामंडल आंदोलन देसी रियासतों में देशी राजाओं के विरुद्धचलाए गए थे

प्रजा मंडल स्थापना के उद्देश्य

रियासती कुशासनउस में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करना

नागरिकों के मौलिक अधिकारोंकी रक्षा करना

राजा के संरक्षण में रियासतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना राजा के संरक्षण में

राजस्थान में राष्ट्रीय चेतना और जनजागृति के विकास के विभिन्न चरण

राजस्थान में राष्ट्रीय चेतना और जन जागृतिका विकास ब्रिटिश आधिपत्य के बाद ही हो गया था

लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो पाया था

राजस्थान में राष्ट्रीय चेतना और जन जागृति के विकासमें राज्य कई महत्वपूर्ण परिस्थितियों ,घटनाओं, और कारणों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी

🌸1857के  संग्राम की पृष्ठभूमि🌸

यह सीमित जनाक्रोश का पहला विस्पोट था

जिसमें भावी लोक चेतना की एक ऐसी पृष्ठभूमितैयार करी थी

जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय चेतना और जन जागृतिकी प्रेरणा दी

🌸सामाजिक एवं धार्मिक सुधारको का योगदान🌸

आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती में राजस्थान में स्थान स्थान पर घूमकर अपने विचारोंसे स्वर्धम, स्वदेश ,स्वभाषा,स्वराजपर जोर दिया

जिससे सामाजिक धार्मिक सुधारों के साथ ही राष्ट्रीय नवचेतना और जन जागृति का संचार हुआ

इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद,साधू निश्चलदास सन्यासी, आत्माराम ,गुरु गोविंद आदि के सतत प्रयासों से राजस्थान में राष्ट्रीय चेतनाउत्पन्न हुई

🌸पाश्चात्य शिक्षा का प्रभाव🌸

ब्रिटिश आधिपत्य के बाद राजस्थान में अंग्रेजी शिक्षा का प्रारंभ हुआ

इसके प्रभाव से महत्वपूर्ण राजनीतिक मामलों पर विचार-विमर्शहोने लगे

शासकों में पारस्परिक एकता की भावना बढी

स्वतंत्रता ,समानता ,उदारता बंधुत्व, देश प्रेम आदि पाश्चात्य विचारों से जनता प्रभावित होकर अपने देश की मुक्ति और अधिकारोंके प्रति सजग होने लगी

🌸समाचार पत्रों और साहित्य की भूमिका🌸

ब्रिटिश एवं रियासती सरकारों की दमनकारी नीति के बावजूद

राजस्थान केसरी,लोकवाणी, सज्जन कीर्ति सुधाकर जैसे अनेक समाचारपत्रों के माध्यम से जन जाग्रति पैदा की गयी

सूर्यमल मिश्रण से लेकर केसरिया बारहठऔर आगे के अनेक कवियों का जनजागृति में महत्वपूर्ण योगदान रहा

इन्होने अपने लेखों के माध्यम से निरंकुश शासन के दोष देशप्रेम और उसकी मुक्तिके प्रयास किए गए

जनकल्याण एक प्रजातांत्रिक संस्थाओंके निर्माण की आवश्यकता का प्रचार-प्रसार कर राष्ट्रीय विचारधाराएव जन जागृति उत्पन्न की गई

🌸यातायात संचार के साधनों की भूमिका🌸

अंग्रेजों ने रेल-सड़क डाक आदि का विकास साम्राज्यवादी हितोंके लिए किया था

लेकिन इसके माध्यम से सभी व्यक्ति और राज्यों का संबंधआपस में बढ़ा

भारत के विभिन्न क्षेत्रों से संपर्क और एकता स्थापितहोने लगी

इससे जनसामान्य के विचारोंका आदान प्रदान हुआ

जिस कारण लोगों में राष्ट्रीय चेतनाका विकास हुआ

🌸जनता की शोचनीय आर्थिक दशा🌸

जनता अपनी दुर्बल आर्थिक दशा का कारण निरंकुश एवं अत्याचारी राजशाही एव उसकी भोगविलास की प्रवृत्ति और अंग्रेजी शासनको मानने लगी

इसका उनमूलन सामूहिक रुप से ही हो सकता है ऐसे विचारलोगों में पनपने लगे

🌸प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव🌸

प्रथम विश्व युद्ध में राजस्थान के सैनिक विदेशोंमें भेजे गए थे

वहां से वे स्वतंत्रता, समानता ,प्रजातंत्,र देश प्रेमआदि विचार अपने साथ लेकर आए

जिससे यहां की जनता को अवगत कराया और उनमें राजनीतिक जागृति उत्पन्नकी गई

अनेक अवसरों पर सैनिकों ने राजशाही के आदेशों की अवहेलना कर जनता पर गोली नहींचलाई

यह परिवर्तन-घटनाएक नए युग की सूचक थी

🌸शासकों में अंग्रेज विरोधी भावना का पनपना🌸

मेवाड़ अलवर भरतपुर आदि के ब्रिटिश विरोधी शासकों को जब ब्रिटिश सरकार ने हटाकर उनके पुत्रों को शासक बनाया

इन घटनाओं ने जनता को उद्वेलित कर दिया

इस घटना ने लोगों को अंग्रेज विरोधी बना दिया

जिससे राजनीतिक चेतनाको बढ़ावा दिया गया

🌸क्रांतिकारियों का योगदान🌸

बीसवीं सदी के प्रारंभ में देश में सशस्त्र क्रांतिके द्वारा अंग्रेजी राज्य के उन्मूलन की योजना बनाई गई

इस योजना में राजस्थान के अनेक क्रांतिकारी शहीदहुए

इन्होने राजस्थान के सोये हुए पौरूष को जगा कर राष्ट्रवाद की भावना की पैदा की

आदिवासी क्षेत्रों में किसान और जनजातीय आंदोलन में राजनीतिक चेतना जागृत करने की दिशा में असाधारण भूमिका का निर्वाह किया

🌸विभिन्न राजनीतिक संगठनों कानिर्माण🌸

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक और बीसवी सदी के प्रथमार्द्ध में सम्य सभा (1883),सेवा समिति (1915 ),अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद (1927) आदि ने राजस्थान की जनता के विचारों को मूर्त रूप दे दिया

राजनीतिक चेतनाका संचार कर दिया

जिसकी पूर्णाहुति प्रजामंडल आंदोलन के द्वारा हुई

🌹यह सभी कारण ,घटनाएं प्रजामंडल आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम की जननीबने

/////  जी  /////

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम के चरण

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम 3 चरणों में विभाजित किया गया था

1⃣पहला चरण प्रारम्भ से 1927ई.के पूर्व

2⃣दूसरा चरण 1927 से 1938ई.

3⃣तीसरा चरण 1938 से 1949 ई.

🌹प्रथम चरणमें प्रत्येक राज्य में यह संघर्ष अन्य राज्य की घटनाओं से प्रभावित रहकर सामाजिक अथवा मानवतावादी समस्याओंपर केंद्रित था

1920 में कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया था कि वह भारतीय राज्यों के मामलों में हस्तक्षेपनहीं करेगी

इस कारण प्रत्येक राज्य में संघर्ष प्राय: राजनीतिक लक्ष्यसे विहीन ही रहा

🌹दूसरा चरण की 1927 में ऑल इंडियन स्टेट पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद)की स्थापना से प्रारंभ हुआ

इस संस्था के स्थापित हो जाने से विभिन्न राज्यों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को एक ऐसा मंच मिल गया था जहां से वे अपनी बात लोगों तक पहुंचासकते थे

1927 में देशी राज्य लोक परिषद् का प्रथम अधिवेशन हुआ था

इस अधिवेशन के बाद राजस्थान के कार्यकर्ता अत्यधिक उत्साह से वापस आए थे

यह सभी कार्यकर्ता इस संस्था की क्षेत्रीय परिषद का गठनकरना चाहते थे

जिससे राजस्थान के सभी राज्यों की गतिविधियों में समन्वय में बना रहे

1931 में राम नारायण चौधरी ने अजमेर में इस संस्था का प्रथम प्रांतीय अधिवेशन किया

जोधपुर में भी जयनारायण व्यास ने इस प्रकार का सम्मेलन करने का प्रयास किया था

लेकिन जोधपुर दरबार की दमनात्मक नीति के कारण इस सम्मेलन का आयोजन ब्यावर नगर में किया गया

इतने प्रयासों के बावजूद भी राजस्थान के राज्य की क्षेत्रीय परिषद का गठन नहीं हो पाया

इस कारण राजस्थान के विभिन्न राज्यों के नेताओ ने अपने अपने राज्यों में अपने ही साधनों से आंदोलन चलाने का निश्चयकिया

प्रजामंडल की स्थापना का आंदोलन यही से प्रारंभ हुआ

🌹तीसरा चरण 1980 कांग्रेस के प्रस्ताव से आरंभ हुआ

इस प्रस्ताव में देशी राज्यों में स्वतंत्रता संघर्ष संबंधित राज्यों के लोगों द्वाराचलाने की बात कही ई गई थी

तीसरे चरणसे ही प्रजामंडल की स्थापना के आंदोलन की शुरुआत हुई

1938 के बाद विभिन्न राज्यों में प्रजामंडल अथवा राज्य परिषदकी स्थापना हुई

प्रत्येक राज्य के लोगों ने राजनीतिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन के लिए आंदोलन किए

🎄राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम

राजस्थान के स्वाधीनता संघर्षके आरंभिक चरण  में किसान और जनजातियों का रियासती शासन के विरुद्ध संघर्षथा

इस चरण में 1897 प्रारंभ होकर 1941 तक चलने वाला बिजोलिया किसान आंदोलन प्रमुखथा

यह आंदोलन स्थानीय आर्थिक धार्मिक मुद्दोंपर आधारित थे

इन आंदोलनों में राष्ट्रीयता की भावना और सामान्य जन भागीदारीका भी अभाव था

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई थी

लेकिन रियासतोंमें लंबे समय तक कांग्रेस या उसके समानांतर संगठननहीं बन पाए थे

क्योंकि रियासतों की जनता दोहरी गुलामी का शिकार थी और जनता राष्ट्रीय धारा से अलग पड़ गई थी

कांग्रेस भी रियासतों के प्रति तटस्थथी

कांग्रेस नहीं चाहती थी कि अंग्रेजों के साथ साथ रियासती राजाओं के साथ भी संघर्ष प्रारंभ हो

महात्मा गांधी के राजनीतिक उत्थानके पश्चात ब्रिटिश आंदोलन की हवा रियासतों में भी पहुंचने लगी

स्थानीय समस्याओं को लेकर विभिन्न प्रकार के आंदोलन होने लगे और विभिन्न राजनीतिक संगठनों की स्थापना होने लगी होने लगा

नारायणी देवी वर्मा

🌹 नारायणी देवी वर्मा का जन्म मध्यप्रदेश की सिंगोली कस्बे मे रामसहाय भटनागर के यहां 1902 में हुआ था

🌹12 वर्ष की आयु में इनका विवाह माणिक्य लाल वर्मा के साथ संपन्न हुआ था

🌹जो बिजोलिया ठिकाने मे नौकरी किया करते थे

🌹जागीरदार के अत्याचारों को देख माणिक्य लाल जी ने जब आजीवन आम जन की सेवा का संकल्प लिया तो नारायणी देवी इस व्रत में उनकी सहयोगिनी बनी

🌹बीमारी के दौरान इलाज के अभाव में इनके दो पुत्रों की मृत्युभी उन्हें इस सेवा कार्य से विरत नहीं कर सकी

🌹माणिक्य लाल वर्मा द्वारा 1934 में सागवाड़ा में खांडलोई आश्रम की स्थापना की गई थी नारायणी देवी द्वारा खांडलोई में भी भीलों के मध्य शिक्षा प्रसार हेतु कार्य किया गया था

🌹1939 में प्रजामंडल के कार्य में भाग लेने के कारण उन्हें जेल जानापड़ा और राज्य से निर्वासित कर दिया गया

🌹 वह अजमेर आई और राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयास किए ताकी रचनात्मक कार्य प्रयास  प्रारंभ किए जा सकते हैं

🌹इसी समय मेवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा तो इन्होंने अकाल सहायता समिति का गठन किया

🌹भारत छोड़ो आंदोलन के समय भी नारायणी देवी वर्मा अपनी 6माह के पुत्र के साथ जेल गई थी

🌹1944 में भीलवाड़ाआ गई और यहां पर 14 नवंबर 1944 को महिला आश्रम की स्थापना की

🌹संस्था की स्थापना का उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों की पत्नियां और उनके परिवारजनों को शिक्षितकरना

🌹उनके परिवारों के भरण पोषण की व्यवस्थाकरना था

🌹1952-53 में माणिक्य लाल वर्मा के साथ मिलकर आदिवासी कन्या छात्रावास की स्थापनाकी

🌹वर्मा जी के निधन के बाद 1970 से 76 तक राज्यसभा की सदस्य रही

🌹12 मार्च 1977 को उनका देहांत हो गया

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम के चरण

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम 3 चरणों में विभाजित किया गया था

1⃣पहला चरण प्रारम्भ से 1927ई.के पूर्व

2⃣दूसरा चरण 1927 से 1938ई.

3⃣तीसरा चरण 1938 से 1949 ई.

🌹प्रथम चरणमें प्रत्येक राज्य में यह संघर्ष अन्य राज्य की घटनाओं से प्रभावित रहकर सामाजिक अथवा मानवतावादी समस्याओंपर केंद्रित था

1920 में कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया था कि वह भारतीय राज्यों के मामलों में हस्तक्षेपनहीं करेगी

इस कारण प्रत्येक राज्य में संघर्ष प्राय: राजनीतिक लक्ष्यसे विहीन ही रहा

🌹दूसरा चरण की 1927 में ऑल इंडियन स्टेट पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद)की स्थापना से प्रारंभ हुआ

इस संस्था के स्थापित हो जाने से विभिन्न राज्यों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को एक ऐसा मंच मिल गया था जहां से वे अपनी बात लोगों तक पहुंचासकते थे

1927 में देशी राज्य लोक परिषद् का प्रथम अधिवेशन हुआ था

इस अधिवेशन के बाद राजस्थान के कार्यकर्ता अत्यधिक उत्साह से वापस आए थे

यह सभी कार्यकर्ता इस संस्था की क्षेत्रीय परिषद का गठनकरना चाहते थे

जिससे राजस्थान के सभी राज्यों की गतिविधियों में समन्वय में बना रहे

1931 में राम नारायण चौधरी ने अजमेर में इस संस्था का प्रथम प्रांतीय अधिवेशन किया

जोधपुर में भी जयनारायण व्यास ने इस प्रकार का सम्मेलन करने का प्रयास किया था

लेकिन जोधपुर दरबार की दमनात्मक नीति के कारण इस सम्मेलन का आयोजन ब्यावर नगर में किया गया

इतने प्रयासों के बावजूद भी राजस्थान के राज्य की क्षेत्रीय परिषद का गठन नहीं हो पाया

इस कारण राजस्थान के विभिन्न राज्यों के नेताओ ने अपने अपने राज्यों में अपने ही साधनों से आंदोलन चलाने का निश्चयकिया

प्रजामंडल की स्थापना का आंदोलन यही से प्रारंभ हुआ

🌹तीसरा चरण 1980 कांग्रेस के प्रस्ताव से आरंभ हुआ

इस प्रस्ताव में देशी राज्यों में स्वतंत्रता संघर्ष संबंधित राज्यों के लोगों द्वाराचलाने की बात कही ई गई थी

तीसरे चरणसे ही प्रजामंडल की स्थापना के आंदोलन की शुरुआत हुई

1938 के बाद विभिन्न राज्यों में प्रजामंडल अथवा राज्य परिषदकी स्थापना हुई

प्रत्येक राज्य के लोगों ने राजनीतिक अधिकारों और उत्तरदायी शासन के लिए आंदोलन किए

राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम

राजस्थान के स्वाधीनता संघर्षके आरंभिक चरण  में किसान और जनजातियों का रियासती शासन के विरुद्ध संघर्षथा

इस चरण में 1897 प्रारंभ होकर 1941 तक चलने वाला बिजोलिया किसान आंदोलन प्रमुखथा

यह आंदोलन स्थानीय आर्थिक धार्मिक मुद्दोंपर आधारित थे

इन आंदोलनों में राष्ट्रीयता की भावना और सामान्य जन भागीदारीका भी अभाव था

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 में हुई थी

लेकिन रियासतोंमें लंबे समय तक कांग्रेस या उसके समानांतर संगठननहीं बन पाए थे

क्योंकि रियासतों की जनता दोहरी गुलामी का शिकार थी और जनता राष्ट्रीय धारा से अलग पड़ गई थी

कांग्रेस भी रियासतों के प्रति तटस्थथी

कांग्रेस नहीं चाहती थी कि अंग्रेजों के साथ साथ रियासती राजाओं के साथ भी संघर्ष प्रारंभ हो

महात्मा गांधी के राजनीतिक उत्थानके पश्चात ब्रिटिश आंदोलन की हवा रियासतों में भी पहुंचने लगी

स्थानीय समस्याओं को लेकर विभिन्न प्रकार के आंदोलन होने लगे और विभिन्न राजनीतिक संगठनों की स्थापना होने लगी होने लगा

नारायणी देवी वर्मा

🌹 नारायणी देवी वर्मा का जन्म मध्यप्रदेश की सिंगोली कस्बे मे रामसहाय भटनागर के यहां 1902 में हुआ था

🌹12 वर्ष की आयु में इनका विवाह माणिक्य लाल वर्मा के साथ संपन्न हुआ था

🌹जो बिजोलिया ठिकाने मे नौकरी किया करते थे

🌹जागीरदार के अत्याचारों को देख माणिक्य लाल जी ने जब आजीवन आम जन की सेवा का संकल्प लिया तो नारायणी देवी इस व्रत में उनकी सहयोगिनी बनी

🌹बीमारी के दौरान इलाज के अभाव में इनके दो पुत्रों की मृत्युभी उन्हें इस सेवा कार्य से विरत नहीं कर सकी

🌹माणिक्य लाल वर्मा द्वारा 1934 में सागवाड़ा में खांडलोई आश्रम की स्थापना की गई थी नारायणी देवी द्वारा खांडलोई में भी भीलों के मध्य शिक्षा प्रसार हेतु कार्य किया गया था

🌹1939 में प्रजामंडल के कार्य में भाग लेने के कारण उन्हें जेल जानापड़ा और राज्य से निर्वासित कर दिया गया

🌹 वह अजमेर आई और राज्य की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयास किए ताकी रचनात्मक कार्य प्रयास  प्रारंभ किए जा सकते हैं

🌹इसी समय मेवाड़ में भयंकर अकाल पड़ा तो इन्होंने अकाल सहायता समिति का गठन किया

🌹भारत छोड़ो आंदोलन के समय भी नारायणी देवी वर्मा अपनी 6माह के पुत्र के साथ जेल गई थी

🌹1944 में भीलवाड़ाआ गई और यहां पर 14 नवंबर 1944 को महिला आश्रम की स्थापना की

🌹संस्था की स्थापना का उद्देश्य स्वतंत्रता सेनानियों की पत्नियां और उनके परिवारजनों को शिक्षितकरना

🌹उनके परिवारों के भरण पोषण की व्यवस्थाकरना था

🌹1952-53 में माणिक्य लाल वर्मा के साथ मिलकर आदिवासी कन्या छात्रावास की स्थापनाकी

🌹वर्मा जी के निधन के बाद 1970 से 76 तक राज्यसभा की सदस्य रही

🌹12 मार्च 1977 को उनका देहांत हो गया

स्वतंत्रता संग्राम के लिए स्थापित राजस्थान के विभिन्न में संगठन

🎋🍁राजपूताना मध्य भारत सभा🍁🎋

जयपुर स्टेट इन ब्रिटिश राज 1933 के लेखक रॉबर्ट डब्ल्यू स्टेर्न के द्वारा सन् 1918 में दिल्लीमें आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में राजस्थान के कई व्यक्तियों ने भाग लिया था

जिसके परिणाम स्वरुप उनका संपर्क अंग्रेजी भारत और अन्य राज्यों के नेताओंसे हुआ

इस अधिवेशन के बाद गणेश शंकर विद्यार्थी, विजय सिंह पथिक, जमुनालाल बजाज ,चांद करण शारदा ,गिरधर , स्वामी नृसिंहदेव सरस्वती आदि ने इस अधिवेशन में भाग लिया था

इन सभी के प्रयासों से 1918 में राजपूताना मध्य भारत सभा नाम की एक राजनीतिक संस्था की स्थापना की गई

इस संस्था री स्थापना दिल्ली के चांदनी चौक स्थित मारवाड़ी पुस्तकालय में हुई थी

जहां इस का प्रथम अधिवेशन महामहोपाध्याय पंडित गिरधर  की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था

इस सभा का मुख्य उद्देश्य रियासतों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना

रियासत के लोगों को कांग्रेस का सदस्यबनाना

इस संस्था का मुख्य कार्यालय कानपुर में रखा गया

कानपुर उत्तरी भारत में मारवाड़ी पूजीपत्तियों और मजदूरों का सबसे बड़ाकेंद्र था

राजपूताना मध्य भारत सभा का अध्यक्ष सेठ जमुनालाल बजाज को बनाया गया

इस सभा का उपाध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थीको बनाया गया

यहां से गणेश शंकर विद्यार्थी द्वारा प्रताप नामक साप्ताहिक पत्र प्रकाशित होता था

जो इस क्षेत्र का प्रमुख राष्ट्रीय पत्रथा

प्रताप समाचार पत्र नें ही बिजोलिया किसान आंदोलन को अखिल भारतीय स्तर पर चर्चित किया था

इस पत्र मैं राजस्थान में राजनीतिक हलचल के प्रसार में अपना योगदान दिया

सभा के सदस्य ने इस सभा को कांग्रेस की सहयोगी संस्था बनाने की कोशिश की

लेकिन प्रारंभ में यह सफल नहींहुए

राजपुताना मध्य भारत का दूसरा अधिवेशन कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही दिसंबर 1919 में अमृतसर में हुआ था

इस संस्था का तीसरा अधिवेशन मार्च 1920 में सेठ जमनालाल बजाज की अध्यक्षता में अजमेर में आयोजित किया गया था

इस सभा का चौथा अधिवेशन दिसंबर 1920 में नागपुर में हुआ था

उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन भी नागपुर में हो रहा था

नागपुर अधिवेशन के समय 1920 में राजपूताना मध्य भारत सभा को कांग्रेस की सहयोगी संस्था मान लिया गया

राजपूताना मध्य भारत सभा के चौथे अधिवेशन के अध्यक्ष नरसिंह चिंतामणि केलकर निर्वाचित हुए थे

कुछ कारणें से वह नागपुर नहीं पहुंच पाए

इस कारण जयपुर के गणेश नारायण सोमानी को सर्वसम्मति से सभा का अध्यक्षचुना गया

अधिवेशन में एक प्रदर्शनी भी लगाई थी जो किसानों की दयनीय स्थिति को दर्शाती थी

राजस्थान के नेताओं के दबाव के कारण कांग्रेस में एक प्रस्ताव पारित किया

जिसमें राजस्थान के राजाओं से आग्रह किया गया कि वह अपनी प्रजा को शासनमें भागीदार बनाएं

राजपूताना मध्य भारत सभा 1920 के बाद सक्रिय नहीं रह पाई

🎋🍁राजस्थान सेवा संघ🍁🎋

राजस्थान सेवा संघ का गठन 1919 में वर्धा मे श्री अर्जुनलाल सेठी केसरी सिंह बारहठ और विजय सिंह पथिक के संयुक्त प प्रयासों से किया गया था

इस संस्था ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी

इस संस्था का मुख्य उद्देश्य जनता की समस्याओं का निवारण करना

जागीरदारों और राजाओं का अपनी प्रजा के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करवाना

जनता में राष्ट्रीय और  राजनीति चेतना जाग्रत करना

इस संस्था ने राजस्थान में राजनीतिक प्रचार के लिए 22 अक्टूबर 1920 से वर्धा से राजस्थान केसरी नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया गया था

विजय सिंह पथिक इस पत्रिका के संपादक थे और रामनारायण चौधरी सह  संपादक थे

राजस्थान केसरी समाचार पत्र के लिए आर्थिक सहायता मुख्य रूप से जमुनालाल बजाज ने की थी

यह पहला पत्रथा जो राजस्थानी लोगों द्वारा प्रकाशितकिया गया था

1920 में इस संस्था का मुख्यालय अजमेर में स्थानांतरित किया गया

राजस्थान सेवा संघ की शाखाएं बूंदी जयपुर जोधपुर सीकर खेतडी कोटा आदि स्थानों पर खोली गई थी

राजस्थान सेवा संघ ने बिजोलिया और बेगू में किसान आंदोलन सिरोही और उदयपुर में भील आंदोलन का मार्गदर्शन किया था

ब्रिटिश सरकार राजस्थान सेवा संघ की गतिविधियों से सशंकित थी

श्री विजय सिंह पथिक ने 1921 में अजमेर से नवीन राजस्थान समाचार पत्रिका प्रकाशन प्रारंभ किया गया

ब्रिटिश सरकार द्वारा नवीन राजस्थान समाचार पत्र पर प्रतिबंधलगा दिया गया

उसके बाद यह समाचार पत्र तरुण राजस्थान के नाम से निकाला गया

तरूण राजस्थान पत्रके संपादन में शोभालाल गुप्त रामनारायण चौधरी जयनारायण व्यासआदि नेताओं ने योगदान दिया

मार्च 1924 में राम नारायण चौधरी और शोभालाल गुप्त को तरुण राजस्थान में देशद्रोहात्मक सामग्री प्रकाशित करने के अपराध में गिरफ्तार किया गया

1924 में मेवाड़ राज्य सरकार द्वारा पथिक को कैद किएजाने के बाद से राजस्थान सेवा संघ के पदाधिकारियों और सदस्यों में आपसी मतभेदशुरू हो गए

धीरे-धीरे मतभेद की खाई इतनी गहरी हो गई की 1928-29 तक राजस्थान सेवा संघ पूर्णतया प्रभावहीन हो गया

🎋🍁सर्व हितकारिणी सभा🍁🎋

सर्व हितकारिणी सभाकी स्थापना सन् 1907में स्वामी गोपाल दास व कन्हैया लाल ढूंढ ने चूरुमें की  थी

इन्होने बालिका शिक्षा को प्रोत्साहित करने हेतु चूरु में पुत्री पाठशाला की स्थापना की थी

दलितों में शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु इन्होनें कबीर पाठशाला की स्थापनाकी गई

सर्व हितकारिणी सभा एक सामाजिक शैक्षणिक संस्था थी

🎋🍁वर्धमान विद्यालय🍁🎋

इसकी स्थापना श्री अर्जुनलाल सेठी द्वारा 1907 में जयपुर में की गई थी

यह संस्था स्वतंत्रता संग्राम के समय राजस्थान की क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बन गई थी

🎋🍁जयपुर हितकारिणी सभा🍁🎋

पंडित हीरालाल शास्त्रीकी प्रेरणा से जयपुर हितकारिणी सभा  का गठन किया गया

इस के अध्यक्ष श्री बाल चंद शास्त्री व मंत्री केसर लाल कटारिया थे

🎋🍁मारवाड़ सेवा संघ🍁🎋

इस संघ का गठन 1920 में श्री जयनारायण व्यास में जोधपुरमें किया था

इस संघ के अध्यक्ष श्री दुर्गा शंकर और मंत्री श्री प्रयाग राज भंडारी थे

यह मारवाड़ राज्य की दूसरी राजनीतिक संस्थाथी

इस संस्था के नेतृत्व में ही चांदमल सुराणा और उनके साथियों ने जोधपूर मे मारवाड़ का तोल आंदोलन किया था

मारवाड़ सरकार ने 100तौले के स्थान पर 80 तौले का सेर प्रचलितकरने का निर्णय लिया था

मारवाड़ सेवासंघ ने इसके विरुद्ध सफल हड़ताल का आयोजन किया

आंदोलन के बाद सरकार को नया तौल जारी करने का निर्णय निरस्त करना पडा

इस संघ का कार्यक्षेत्र अधिक विस्तृत था

🎋🍁मारवाड़ हितकारिणी सभा🍁🎋

जोधपुर में जन आंदोलन की शुरुआत 1918 में चांदमल सुराणा द्वारा मारवाड़ हितकारिणी सभा की स्थापना से मानी जाती है

मारवाड़ सेवा संघ के निष्क्रिय हो जाने के पश्चात जय नारायण व्यास द्वारा इस सभा को 1923 में पुनर्गठित किया गया था

मारवाड़ हितकारिणी सभा की पहली स्थापना चांदमल सुराणाद्वारा की गई थी

मारवाड़ हितकारिणी सभा द्वारा किसानों की ओर ध्यान आकर्षित करने के उद्देश्य से “”पोपाबाई की पोल”” और “”मारवाड़ की अवस्था”” नाम से दो पुस्तकेंप्रकाशित की गई थी

🎋🍁मारवाड यूथ लीग🍁🎋

10 मई 1931 को जोधपुर में जय नारायण व्यासके निवास स्थान पर मारवाड यूथ लीग नामक संस्था की स्थापना की गई थी

इस संस्था का प्रमुख उद्देश्य जोधपुर के साथ साथ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में जन चेतना का प्रसार करना था

इस लीग को राज्य सरकार द्वारा अवैध घोषित करने से पूर्व ही एक अन्य संस्था बाल भारत सभा बनाई गई

बाल भारत सभा का मंत्री छगन लाल चौपासनीवाला को बनाया गया

🎋🍁मारवाड़ राज्य लोक परिषद🍁🎋

मारवाड़ राज्य लोक परिषद के गठन में जोधपुर राज्य में किसान आंदोलन के नए युगका शुभारंभ किया

इस परिषद का प्रथम सम्मेलन 25 नवंबर 1931 को चांद करण शारदा की अध्यक्षतामें अजमेर के निकट पुष्कर में आयोजित किया गया था

कस्तूरबा गांधी काकासाहेब कालेलकर मनीभाई कोठारीने इस सम्मेलन में भाग लिया था

🎋🍁हरि कीर्तन समाज🍁🎋

1925 26 में अलवर में हरि कीर्तन समाज की स्थापना की गई

इस संस्था को आगे चलकर राजर्षि अभय समाज के नाम से जाना गया अलवर आंदोलनों से ही प्रजामंडल आंदोलन की वास्तविक शुरुआत हुई थी

🎋🍁साहित्य प्रचारिणी सभा🍁🎋

इस सभा का गठन कुँवर मदन सिंह और पूरण सिंह ने 1915 में करौलीमें किया था

बाद में इसका नाम साहित्य परिषदकर दिया गया

1920 में करौली के तत्कालीन दीवान ने इस सभा को करौली की प्रतिनिधि सभा के रूपमें स्वीकार कर लिया था

🎋🍁आचार सुधारनी सभा🍁🎋

1910 में यमुना प्रसाद वर्मा ने धौलपुर में आचार सुधारिणी सभा की स्थापना की थी 1911 में यमुना प्रसाद और ज्वाला प्रसादनें धौलपुर में आर्य समाज की स्थापना की थी

8 अगस्त 1918 को स्वामी श्रद्धानंद के नेतृत्व में धौलपुर में प्रशासन और स्वदेशी आंदोलन प्रारंभ हुआ था

स्वामी श्रद्धानंद की मृत्युके बाद यह आंदोलन समाप्त हो गया था

🎋🍁तिलक समिति🍁🎋

शेखावाटी में 1924 में तिलक समित की स्थापना की गई थी

इस समिति की शाखाएंअलग-अलग स्थानों पर स्थापित की गई थी

इस समिति का उद्देश्य समाजसेवाथा

वास्तव में समिति शेखावाटी में राष्ट्रीय विचारों के प्रसार का कार्य करती थी

🎋🍁मित्र मंडल🍁🎋

मित्र मंडल नामक संगठन की स्थापना बाबू मुक्ता प्रसाद ने बीकानेर में की थी

इसके द्वारा बीकानेर स्टेशन पर पानी पिलाने व लावारिस मृतकों का दाह संस्कार आदि कार्य किया जाता था

राजस्थान के भौतिक विभाग

पृथ्वी अपने निर्माण के प्रराम्भिक काल में एक विशाल भू-खण्ड पैंजिया तथा एक विशाल महासागर पैंथालासा के रूप में विभक्त था कलांन्तर में पैंजिया के दो टुकडे़ हुए उत्तरी भाग अंगारालैण्ड तथा दक्षिणी भाग गोडवानालैण्ड के नाम जाना जाने लगा। तथा इन दोनों

भू-खण्डों के मध्य का सागरीय क्षेत्र टेथिस सागर कहलाता है। राजस्थान का पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र तथा उसमें स्थित खारे पानी की झीलें टेथिस सागर का अवशेष है। जबकि राजस्थान का मध्य पर्वतीय प्रदेश तथा दक्षिणी पठारी क्षेत्र गोडवानालैण्ड का अवशेष है।

भौतिक विभाग:-

राजस्थान को समान्यतः चार भौतिक विभागो में बांटा जाता हैः-

  1. पश्चिमी मरूस्थली प्रदेश
  2. अरावली पर्वतीय प्रदेश
  3. पूर्वी मैदानी प्रदेश
  4. दक्षिणी पूर्वी पठारी भाग
  1. पश्चिमी मरूस्थली प्रदेशः-

राजस्थान का अरावली श्रेणीयों के पश्चिम का क्षेत्र शुष्क एवं अर्द्धशुष्क मरूस्थली प्रदेश है। यह एक विशिष्ठ भौगोलिक प्रदेश है। जिसे भारत का विशाल मरूस्थल अथवा थार का मरूस्थल के नाम से जाना जाता है। थार का मरूस्थल विश्व का सर्वाधिक आबाद तथा वन

वनस्पति वाला मरूस्थल है। ईश्वरी सिंह ने थार के मरूस्थल को रूक्ष क्षेत्र कहा है। राज्य के कुल क्षेत्रफल का 61 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

प्राचीन काल में इस क्षेत्र से होकर सरस्वती नदि बहती थी। सरस्वती नदी के प्रवाह क्षेत्र के जैसलमेर जिले के चांदन गांव में चांदन नलकुप की स्थापना कि गई है। जिसे थार का घडा कहा जाता है।

इसका विस्तार बाड़मेर, जैसलमेर, बिकानेर, जोधपुर, पाली, जालोर, नागौर,सीकर, चुरू झूझूनु, हनुमानगढ़ व गंगानगर 12 जिलों में है।संपुर्ण पश्चिमी मरूस्थलिय क्षेत्र समान उच्चावच नहीं रखता अपीतु इसमें भिन्नता है। इसी भिन्नता के कारण इसको 4 उपप्रदेशों में

विभक्त किया जाता है-

  1. शुष्क रेतीला अथवा मरूस्थलीय प्रदेश
  2. लूनी- जवाई बेसीन
  3. शेखावाटी प्रदेश
  4. घग्घर का मैदान

1 शुष्क रेतीला अथवा मरूस्थलीय प्रदेश:-

यह वार्षिक वर्षा का औसत 25 सेमी. से कम है। इसमें जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर एवं जोधपुर और चुरू जिलों के पश्चिमी भाग सम्मलित है। इन प्रदेश में सर्वत्र बालुका – स्तुपों का विस्तार है।

पश्चिमी रेगीस्तान क्षेत्र के जैसलमेर जिले में सेवण घास के मैदान पाए जाते है। जो कि भूगर्भिय जल पट्टी के रूप में प्रसिद्ध है। जिसे लाठी सीरिज कहलाते है।

पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्र के जैसलमेर जिले में लगभग 18 करोड़ वर्ष पुराने वृक्षों के अवशेष एवं जीवाश्म मिले है। जिन्हें ? अकाल वुड फाॅसिल्स पार्क? नाम दिया है। पश्चिमी रेगिस्तान क्षेत्र के जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर जिलों में पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैसों के भंडार

मिले है।

2 लुनी – जवाई बेसीनः-

यह एक अर्द्धशुष्क प्रदेश है। जिसमें लुनी व इसकी प्रमुख नदी जवाई एवं अन्य सहायक नदियां प्रवाहित होती है। इसका विस्तार पालि, जालौर, जौधपुर व नागौर जिले के दक्षिणी भाग में है। यह एक नदी निर्मीत मैदान है। जिसे लुनी बेसिन के नाम से जाना जाता है।

3 शेखावाटी प्रदेशः-

इसे बांगर प्रदेश के नाम से जाना जाता है। शेखावटी प्रदेश का विस्तार झुझुनू, सीकर, चुरू तथा नागौर जिले के उतरी भाग में है। इस प्रदेश में अनेक नमकीन पानी के गर्त(रन) हैं जिसमें डीडवाना, डेगाना, सुजानगढ़, तालछापर, परीहारा, कुचामन आदि प्रमुख है।

4 घग्घर का मैदानः-

गंगानगर हनुमानगढ़ जिलों का मैदानी क्षेत्र का निर्माण घग्घर के प्रवाह क्षेत्र के बाढ़ से हुआ है।

तथ्यः- भारत का सबसे गर्म प्रदेश राजस्थान का पश्चिमी शुष्क प्रदेश है।

टीलों के बीच की निम्न भूमी में वर्षा का जल भरने से बनी अस्थाई झीलों को स्थानीय भाषा में टाट या रन कहा जाता है।

राष्ट्रीय कृषि आयोग द्वारा राजस्थान के 12 जिलों श्री गंगानगर, हनुमानगढ, बीकानेर, नागौर, चुरू, झुझुनू, जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, पाली, जालौर व सीकर को रेगिस्तानी घोषित किया।

मरूस्थलीय क्षेत्र में पवनों की दिशा के समान्तर बनने वाले बालूका स्तुपों को अनुर्देघय बालूका, समकोण बनाने वाले बालूका स्तुपों को अनुप्रस्थ बालुका कहतें है।

(क) इर्ग:- सम्पूर्ण रेतीला मरूस्थल (जैसलमेर)

(ख) हम्माद:- सम्पूर्ण पथरीला मरूस्थल (जोधपुर)

(ग)  रैंग:- रेतीला और पथरीला (मिश्रित मरूस्थल)

रेगिस्तानी क्षेत्र में बालूका स्तूपों के निम्न प्रकार पाये जाते है।

1 अनुप्रस्थ:- पवन/वायु की दिशा में बनने वाले बालुका स्तूप (सीधे)

2 अनुदैध्र्य :- आडे -तीरछे बनने वाले बालुका स्तूप

3 बरखान  :- रेत के अर्द्धचन्द्राकार बालुका स्तूप

2 अरावली पर्वतीय प्रदेशः-

राज्य के मध्य अरावली पर्वत माला स्थित है। यह विश्व की प्राचीनतम वलित पर्वत माला है। यह पर्वत श्रृंखला श्री केम्ब्रियन (पोलियोजोइक) युग की है। यह पर्वत श्रृखला दंिक्षण-पश्चिम से उतर-पूर्व की ओर है। इस पर्वत श्रृंखला की चौैडाई व ऊंचाई  दक्षिण -पश्चिम में

अधिक है। जो धीरे -धीरे उत्तर-पूर्व में कम होती जाती है।

यह दक्षिण -पश्चिम में गुजरात के पालनपुर से प्रारम्भ होकर उत्तर-पूर्व में दिल्ली तक लम्बी है। जबकि राजस्थान में यह श्रंृखला खेडब्रहमा (सिरोही) से खेतड़ी (झुनझुनू) तक 550 कि.मी. लम्बी है जो कुल पर्वत श्रृंखला का 80 प्रतिशत है।

अरावली पर्वत श्रंृखला राजस्थान को दो असमान भागों में बांटती है। अरावली पर्वतीय प्रदेश का विस्तार राज्य के जिलों सिरोही, उदयपुर, राजसमंद, अजमेर, जयपूर, दौसा और अलवर में आदि में है।

अरावली पर्वतमाला की औसत ऊँचाई समुद्र तल से 930 मीटर है।

राज्य के कुल क्षेत्रफल का 9.3 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 10 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।

अरावली पर्वतमाला को ऊँचाई के आधार पर तीन प्रमुख उप प्रदेशों में विभक्त किया गया है।

1 दक्षिणी अरावली प्रदेश

2 मध्यवर्ती अरावली प्रदेश

3 उतरी – पूर्वी अरावली प्रदेश

1 दक्षिणी अरावली प्रदेश:-

इसमें सिरोही उदयपुर और राजसमंद सम्मिलित है। यह पुर्णतया पर्वतीय प्रदेश है इस प्रदेश में गुरूशिखर(1722 मी.) सिरोही जिले में मांउट आबु क्षेत्र में स्थित है जो राजस्थान का सर्वोच्च पर्वत शिखर है।

यहां की अन्य प्रमुख चोटियां निम्न है:-

सेर(सिरोही)-1597 मी. , देलवाडा(सिरोही)-1442 मी. , जरगा-1431 मी. , अचलगढ़- 1380 मी. , कुंम्भलगढ़(राजसमंद)-1224 मी.

प्रमुख दर्रे(नाल)ः-

जीलवा कि नाल(पगल्या नाल)- यह मारवाड से मेवाड़ जाने का रास्ता है।

सोमेश्वर की नाल विकट तंग दर्रा,हाथी गढ़ा की नाल कुम्भलगढ़ दुर्ग इसी के पास बना है।

सरूपघाट, देसुरी की नाल(पाली) दिवेर एवं हल्दी घाटी दर्रा(राजसमंद) आदि प्रमुख है।

आबू पर्वत से सटा हुआ उडि़या पठार आबू से लगभग 160 मी. ऊँचा है। और गुरूशिखर मुख्य चोटी के नीचे स्थित है। जेम्स टाॅड ने गुरूशिखर को सन्तों का शिखर कहा जाता है। यह हिमालय और नीलगिरी के बीच सबसे ऊँची चोटी है।

2 मध्यवर्ती अरावली प्रदेशः-

यह मुख्यतयः अजमेर जिले में फैेला है। इस क्षेत्र में पर्वत श्रेणीयों के साथ संकरी घाटियाँ और समतल स्थल भी स्थित है। अजमेर के दक्षिणी पश्चिम में तारागढ़(870 मी.) और पश्चिम में सर्पीलाकार पर्वत श्रेणीयां नाग पहाड़(795 मी.)  कहलाती है।

प्रमुख दर्रे:-

बर, परवेरियां, शिवपुर घाट, सुरा घाट, देबारी, झीलवाडा, कच्छवाली, पीपली, अनरिया आदि।

3 उतरी – पुर्वी अरावली प्रदेशः- इस क्षेत्र का विस्तार जयपुर, दौसा तथा अलवर जिले में है। इस क्षेत्र में अरावली की श्रेणीयां अनवरत न हो कर दुर – दुर हो जाती है। इस क्षेत्र में पहाड़ीयों की सामान्य ऊँचाई 450 से 700 मी. है। इस प्रदेश की प्रमुख चोटियां:-

रघुनाथगढ़(सीकर)- 1055 मी. ,खोह(जयपुर)-920 मी. , भेराच(अलवर)-792 मी. , बरवाड़ा(जयपुर)-786 मी.।

  1. पूर्वी मैदानी भाग:-

अरावली पर्वत के पूर्वी भाग और दक्षिणी-पूर्वी पठारी भाग के दक्षिणी भाग में पूर्व का मैदान स्थित है। यह मैदान राज्य के कुल क्षेत्रफल का 23.3 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 39 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। इस क्षेत्र में – भरतपुर, अलवर, धौलपुर, करौली,

सवाईमाधोपुर, जयुपर, दौसा, टोंक, भीलवाडा तथा दक्षिण कि ओर से डुंगरपुर, बांसवाडा ओर प्रतापगढ जिलों के मैदानी भाग सम्मिलित है। यह प्रदेश नदी बेसिन प्रदेश है अर्थात नदियों द्वारा जमा कि गई मिट्टी से इस प्रदेश का निर्माण हुआ है। इस प्रदेश में कुओं द्वारा

सिंचाई अधिक होती है। इस मैदानी प्रदेश के तीन उप प्रदेश है।

1 बनास- बांणगंगा बेसीन

2 चंम्बल बेसीन

3 मध्य माही बेसीन

1 बनास- बांणगंगा बेसीनः-

बनास और इसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित यह एक विस्तृत मैदान है यह मैदान बनास और इसकी सहायक  बाणगंगा, बेड़च, डेन, मानसी, सोडरा, खारी, भोसी, मोरेल आदि नदियों द्वारा निर्मीत यह एक विस्तृत मैदान है जिसकी ढाल पूर्व की और है।

2 चम्बल बेसीनः-

इसके अन्तर्गत कोटा, सवाईमाधोपुर, करौली तथा धौलपुर जिलों का क्षेत्र सम्मिलित है। कोटा का क्षेत्र हाड़ौती में सम्मिलित है किंतु यहां चम्बल का मैदानी क्षेत्र स्थित है। इस प्रदेश में सवाईमाधोपुर, करौली एवं धौलपुर में चम्बल के बीहड़ स्थित है। यह अत्यधिक कटा-

फटा क्षेत्र है, इनके मध्य समतल क्षेत्र स्थ्ति है।

3 मध्य माही बेसीन या छप्पन का मैदान:-

इसका विस्तार उदयपुर के दक्षिण पुर्व से डुंगरपुर, बांसवाडा और प्रतापगढ़ जिलों में है। माही मध्य प्रदेश से निकल कर इसी प्रदेश से गुजरती हुई खंभात कि खाडी में गिरती है। यह क्षेत्र वागड़ के नाम से पुकारा जाता है तथा प्रतापगढ़ व बांसवाड़ा के मध्य भाग में

छप्पन ग्राम समुह स्थित है। इसलिए यह भू-भाग छप्पन के मैदान के नाम से भी जाना जाता है।

4दक्षिण-पूर्व का पठारी भाग:-

राज्य के कुल क्षेत्रफल का 9.6 प्रतिशत है। इस क्षेत्र में राज्य की 11 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है। राजस्थान के  इस क्षेत्र में राज्य के चार जिले कोटा, बूंदी, बांरा, झालावाड़ सम्मिलित है।इस पठारी भग की प्रमुख नदी चम्बल नदी है और इसकी सहायक नदियां

पार्वती, कालीसिद्ध, परवन, निवाज, इत्यादि भी है। इस पठारी भाग की नदीयां है। इस क्षेत्र में वर्षा का औसत 80 से 100 से.मी. वार्षिक है।

राजस्थान का झालावाड़ जिला राज्य का सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला जिला है और यह राज्य का एकमात्र अति आद्र जिला है। इस क्षेत्र में मध्यम काली मिट्टी की अधिकता है। जो कपास, मूंगफली के लिए अत्यन्त उपयोगी है।

यह पठारी भाग अरावली और विध्यांचल पर्वत के बीच “सक्रान्ति प्रदेश” ( ज्तंदेपजपवदंस इमसज) है।

दक्षिणी-पूर्वी पठारी भाग को दो भागों में बांटा गया है।

1 हाडौती का पठार – कोटा, बंूदी, बांरा, झालावाड़

2 विन्ध्यन कगार भूमि – धौलपुर. करौली, सवाईमाधोपुर

राजस्थान की जलवायु

जलवायु:-

किसी क्षेत्र विषेष में एक लम्बी अवधि के दौरान मौसम की औसत अवस्था जलवायु कहलाती है।

मौसम:-

किसी क्षेत्र विषेष में छोटी अवधि के दौरान वातावरण की औरत दषा को मौसम कहा जाता है।

३जलवायु को प्रभावित करने वाले तत्व:-

  1. वायु की गति
  2. वायु में नमी/आर्द्रता
  3. तापमान
  4. वर्षा

राजस्थान की जलवायु की विषेषताएॅं:-

  1. राजस्थान की जलवायु गर्म (उष्ण) शुष्क प्रकार की है।
  1. राजस्थान के द.पूर्व में अधिक वर्षा व उतर पष्चिम में कम वर्षा होती है।
  1. राजस्थान के द.पूर्व में अधिक वर्षा उतर पूर्व की ओर क्रमशः घटती जाती है।
  1. राजस्थान में वर्षा की अनियमितता व अनिष्चितता के कारण अधिकाषतः सुखे की स्थिति बनी रहती है।

राजस्थान में जलवायु का अध्ययन करने पर तीन प्रकार की ऋतुएं पाई जाती हैः-

  1. ग्रीष्म ऋतु: (मार्च से मध्य जून तक)
  2. वर्षा ऋतु : (मध्य जून से सितम्बर तक)
  3. शीत ऋतु : (नवम्बर से फरवरी तक)

ग्रीष्म ऋतु:-

राजस्थान में मार्च से मध्य जून तक ग्रीष्म ऋतु होती है। इसमें मई व जून के महीने में सर्वाधिक गर्मी पड़ती है। इस समय राजस्थान का औरत तापमान 440C होता है किन्तु गंगानगर, चुरू व बीकानेर का तापमान 500C तक हो जाता है। अधिक गर्मी के वायु

मे नमी समाप्त हो जाती है। परिणाम स्वरूप वायु हल्की होकर उपर चली जाती है। अतः राजस्थान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है परिणामस्वरूप उच्च वायुदाब से वायु निम्न वायुदाब की और तेजगति से आती है इससे गर्मियों में आंधियों का प्रवाह बना रहता है।

राजस्थान में 35 दिनों तक आंधियां आती है।

सर्वाधिक आंधियां गंगानगर जिले में आती है

(28 दिनों तक)

इस समय पश्चिमी राजस्थान में गर्म व षुष्क हवाये चलती है। जिन्हे “लू” कहा जाता है। पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर जिले का “फलौदी क्षेत्र” सर्वाधिक शुष्क क्षेत्र है।

वर्षा ऋतु:-  राजस्थान में मध्य जून से सितम्बर तक वर्षा ऋतु होती है। इस समय दक्षिणी पश्चिमी मानसून से राजस्थान में वर्षा होती है।

दक्षिण पश्चिम मानसून की दो शाखाएं होती है:-

  1. अरब सागर शाखा:
  2. बंगाल की खाड़ी की शाखा:

अरब सागर की शाखा राजस्थान के समीप है किन्तु अरब सागर से आने वाला मानसून अरावली पर्वत के समान्तर होने के कारण राजस्थान से आगे निकल जाता है। इससे पश्चिमी राजस्थान में नामात्र की वर्षा होती है जबकि बंगाल की खाड़ी से आने वाला मानसून

हजारों किमी. की दूरी तय करके राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग पर पहंुचता है। बंगाल की खाड़ी के मानसून से राजस्थान के दक्षिणी-पूर्वी भाग में वर्षा होती है।

राजस्थान में वर्षा का औरत 53.5 से.मी. वार्षिक है।

राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान माऊंट आबू (150 से.मी.वार्षिक) है।

सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला जिला झालावाड़ (100 से.मी वार्षिक ) है।

न्यूनतम वर्षा प्राप्त करने वाला जिला जैसलमेर (10 से.मी.वार्षिक)

शीत ऋतु:-

राजस्थान में नम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु होती है। इन चार महीनों में जनवरी माह में सर्वाधिक सर्दी पड़ती है। इस समय राज्य का औरत तापमान 120C जाता है। गंगानगर, बीकानेर, चुरू में यह तापमान 00C जाता है। राजस्थान में सर्वाधिक ठण्डा स्थान

माऊंट आबू है जहां तापमान 00C भी नीचे चला जाता है।शीत ऋतु में भूमध्यसागर में उठने वाले चक्रवातों के कारण राजस्थान के उतरी पश्चिमी भाग में वर्षा होती है। जिसे “मावट/मावठ” कहा जाता है। यह वर्षा माघ महीने में होती है। शीतकालीन वर्षा मावट को –

गोल्डन ड्रोप (अमृत बूदे) भी कहा जाता है। यह रवि की फसल के लिए लाभदायक है।

राज्य में हवाएं प्राय पश्चिम और उतर-पश्चिम की ओर चलती है।

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🎯राजस्थान की जलवायु🎯

राजस्थान की जलवायु शुष्क से उपआर्द्र मानसूनी जलवायु है अरावली के पश्चिम में न्यून वर्षा, उच्च दैनिक एवं वार्षिक तापान्तर निम्न आर्द्रता तथा तीव्रहवाओं युक्त जलवायु है। दुसरी और अरावली के पुर्व में अर्द्रशुष्क एवं उपआर्द्र जलवायु है।

🎯जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक

अक्षांशीय स्थिती, समुद्रतल से दुरी, समुद्र तल से ऊंचाई, अरावली पर्वत श्रेणियों कि स्थिति एवं दिशा आदि।

🎯राजस्थान की जलवायु कि प्रमुख विशेषताएं –

शुष्क एवं आर्द्र जलवायु कि प्रधानता

अपर्याप्त एंव अनिश्चित वर्षा

वर्षा का अनायस वितरण

अधिकांश वर्षा जुन से सितम्बर तक

वर्षा की परिर्वतनशीलता एवं न्यूनता के कारण सुखा एवं अकाल कि स्थिती अधिक होना।

राजस्थान कर्क रेखा के उत्तर दिशा में स्थित है। अतः राज्य उपोष्ण कटिबंध में स्थित है। केवल डुंगरपुर और बांसवाड़ा जिले का कुछ हिस्सा उष्ण कटिबंध में स्थित है।

अरावली पर्वत श्रेणीयों ने जलवायु कि दृष्टि से राजस्थान को दो भागों में विभक्त कर दिया है। अरावली पर्वत श्रेणीयां मानसुनी हवाओं के चलने कि दिशाओं के अनुरूप होने के कारण मार्ग में बाधक नहीं बन पाती अतः मानसुनी पवनें सीधी निकल जाति है और वर्षा नहीं करा

पाती। इस प्रकार पश्चिमी क्षेत्र अरावली का दृष्टि छाया प्रदेश होने के कारण अल्प वर्षा प्राप्त करताह है।

जब कर्क रेखा पर सुर्य सीधा चमकता है तो इसकी किरणें बांसवाड़ा पर सीधी व गंगानगर जिले पर तिरछी पड़ती है। राजस्थान का औसतन वार्षिक तापमान 37 डिग्री से 38 डिग्री सेंटीग्रेड है।

🎯राजस्थान को जलवायु की दृष्टि से पांच भागों में बांटा है।

शुष्क जलवायु प्रदेश(0-20 सेमी.)

अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश(20-40 सेमी.)

उपआर्द्र जलवायु प्रदेश(40-60 सेमी.)

आर्द्र जलवायु प्रदेश(60-80 सेमी.)

अति आर्द्र जलवायु प्रदेश(80-100 सेमी.)

🎯राजस्थान की जलवायु

  1. शुष्क प्रदेश

क्षेत्र – जैसलमेर, उत्तरी बाड़मेर, दक्षिणी गंगानगर तथा बीकानेर व जोधपुर का पश्चिमी भाग। औसत वर्षा – 0-20 सेमी.।

  1. अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – चुरू, गंगानगर, हनुमानगढ़, द. बाड़मेर, जोधपुर व बीकानेर का पूर्वी भाग तथा पाली, जालौर, सीकर,नागौर व झुझुनू का पश्चिमी भाग।

औसत वर्षा – 20-40 सेमी.।

  1. उपआर्द्ध जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – अलवर, जयपुर, अजमेर, पाली, जालौर, नागौर व झुझुनू का पूर्वी भाग तथा टोंक, भीलवाड़ा व सिरोही का उत्तरी-पश्चिमी भाग।

औसत वर्षा – 40-60 सेमी.।

  1. आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – भरतपुर, धौलपुर, कोटा, बुंदी, सवाईमाधोपुर, उ.पू. उदयपुर, द.पू. टोंक तथा चित्तौड़गढ़।

औसत वर्षा – 60-80 सेमी.।

  1. अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – द.पू. कोटा, बारां, झालावाड़, बांसवाडा, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, द.पू. उदयपुर तथा माउण्ट आबू क्षेत्र।

औसत वर्षा – 80-100 सेमी.।

🎯तथ्य

राजस्थान के सबसे गर्म महिने मई – जुन है तथा ठण्डे महिने दिसम्बर – जनवरी है।

राजस्थान का सबसे गर्म व ठण्डा जिला – चुरू

राजस्थान का सर्वाधिक दैनिक तापान्तर पश्चिमी क्षेत्र में रहता है।

राजस्थान का सर्वाधिक दैनिक तापान्तर वाला जिला -जैसलमेर

राजस्थान में वर्षा का औसत 57 सेमी. है जिसका वितरण 10 से 100 सेमी. के बीच होता है। वर्षा का असमान वितरण अपर्याप्त और अनिश्चित मात्रा हि राजस्थान में हर वर्ष सुखे व अकाल का कारण बनती है।

राजस्थान में वर्षा की मात्रा दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम की ओर घटती है। अरब सागरीय मानसुन हवाओं से राज्य के दक्षिण व दक्षिण पूर्वी जिलों में पर्याप्त वर्षा हो जाती है।

राज्य में होने वाली वर्षा की कुल मात्रा का 34 प्रतिशत जुलाई माह में, 33 प्रतिशत अगस्त माह में होती है।

जिला स्तर पर सर्वाधिक वर्षा – झालावाड़(100 सेमी.)

जिला स्तर पर न्यूनतम वर्षा – जैसलमेर(10 सेमी.)

राजस्थान में वर्षा होने वाले दिनों की औसत संख्या 29 है।

वर्षा के दिनों की सर्वाधिक संख्या – झालावाड़(40 दिन), बांसवाड़ा(38 दिन)

वर्षा के दिनों की न्यूनतम संख्या – जैसलमेेर(5 दिन)

राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान – माउण्ट आबु(120-140 सेमी.) है यहीं पर वर्षा के सर्वाधिक दिन(48 दिन) मिलते हैं।

वर्षा के दिनों की संख्या उत्तर पश्चिम से दक्षिण पूर्व की ओर बढ़ती है।

राजस्थान में सबसे कम आर्द्रता – अप्रैल माह में

राजस्थान मे सबसे अधिक आर्द्रता – अगस्त माह में

राजस्थान में सबसे सम तापमान – अक्टुबर माह में रहता है।

सबसे कम वर्षा वाला स्थान – सम(जैसलमेर) 5 सेमी.

राजस्थान को 50 सेमी. रेखा दो भागों में बांटती है। 50 सेमी. वर्षा रेखा की उत्तर-पश्चिम में कम होती है। जबकि दक्षिण पूर्व में वर्षा अधिक होती है।

यह 50 सेमी. मानक रेखा अरावली पर्वत माला को माना जाता है।

राजस्थान में सर्वाधिक आर्द्रता वाला जिला झालावाड़ तथा न्यूनतम जिला जैसलमेर है। राजस्थान में सर्वाधिक आर्द्रता वाला स्थान माउण्ट आबू तथा कम आर्द्रता फलौदी(जोधपुर) है।

राजस्थान में सर्वाधिक ओलावृष्टि वाला महिना मार्च-अप्रैल है तथा सर्वाधिक ओलावृष्टि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में होती है तथा सर्वाधिक ओलावृष्टि वाला जिला जयपुर है।

राजस्थान में हवाऐं पाय पश्चिम व दक्षिण पश्चिम की ओर चलती है।

हवाओं की सर्वाधिक गति – जून माह

हवाओं की मंद गति – नवम्बर माह

ग्रीष्म ऋतु में पश्चिम क्षेत्र क्षेत्र का वायुदाब पूर्वी क्षेत्र से कम होता है।

ग्रीष्म ऋतु में पश्चिम की तरफ से गर्म हवाऐं चलती है जिन्हें लू कहते है। इस लू के कारण यहां निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। इस निम्न वायुदाब की पूर्ती हेतु दुसरे क्षेत्र से (उच्च वायुदाब वाले क्षेत्रों से) तेजी से हवा उठकर आती है जो अपने साथ धुल व मिट्टी

उठाकर ले आती है इसे ही आंधी कहते हैं।

आंधियों की सर्वाधिक संख्या – श्रीगंगानगर(27 दिन)

आंधियों की न्यूनतम संख्या – झालावाड़ (3 दिन)

राजस्थान के उत्तरी भागों में धुल भरी आधियां जुन माह में और दक्षिणी भागों में मई माह में आति है।

राजस्थान में पश्चिम की अपेक्षा पूर्व में तुफान(आंधी + वर्षा) अधिक आते है।

🎯आर्द्रता

वायु में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता कहते है। आपेक्षिक आर्द्रता मार्च-अप्रैल में सबसे कम व जुलाई-अगस्त में सर्वाधिक होती है।

🎯लू____

मरूस्थलीय भाग में चलने वाली शुष्क व अति गर्म हवाएं लू कहलाती है।

समुद्र तल से ऊंचाई बढ़ने के साथ तापमान घटता है। इसके घटने की यह सामान्य दर 165 मी. की ऊंचाई पर 1 डिग्री से.ग्रे. है।

राजस्थान के उत्तरी-पश्चिमी भाग से दक्षिणी-पुर्वी की ओर तापमान में कमी दृष्टि गोचर होती है।

🎯तथ्यडा.ब्लादीमीर कोपेन, ट्रिवार्था, थार्नेवेट के जलवायु वर्गीकरण के अनुसार राजस्थान को 4 जलवायु प्रदेशों में बांटा गया।

Aw उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेश

BShw अर्द्ध शुष्क कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेश

BWhw उष्ण कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेश

Cwgउप आर्द्र जलवायु प्रदेश

🎯राजस्थान को कृषि की दृष्टि से निम्न लिखित दस जलवायु प्रदेशों में बांटा गया है।

1.शुष्क पश्चिमी मैदानी

2.सिंचित उत्तरी पश्चिमी मैदानी

3.शुष्क आंशिक सिंचित पश्चिमी मैदानी

4.अंन्त प्रवाही

5.लुनी बेसिन

6.पूर्वी मैदानी(भरतपुर, धौलपुर, करौली जिले)

7.अर्द्र शुष्क जलवायु प्रदेश

8.उप आर्द्र जलवायु प्रदेश

9.आर्द्र जलवायु प्रदेश

10.अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

🎯राजस्थान में जलवायु का अध्ययन करने पर तीन प्रकार की ऋतुएं पाई जाती हैः-

ग्रीष्म ऋतु: (मार्च से मध्य जून तक)

वर्षा ऋतु : (मध्य जून से सितम्बर तक)

शीत ऋतु : (नवम्बर से फरवरी तक)

🎯ग्रीष्म ऋतु_____

राजस्थान में मार्च से मध्य जून तक ग्रीष्म ऋतु होती है। इसमें मई व जून के महीने में सर्वाधिक गर्मी पड़ती है। अधिक गर्मी के वायु मे नमी समाप्त हो जाती है। परिणाम स्वरूप वायु हल्की होकर उपर चली जाती है। अतः राजस्थान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है

परिणामस्वरूप उच्च वायुदाब से वायु निम्न वायुदाब की और तेजगति से आती है इससे गर्मियों में आंधियों का प्रवाह बना रहता है।

🎯वर्षा ऋतु

राजस्थान में मध्य जून से सितम्बर तक वर्षा ऋतु होती है।

🎯राजस्थान में 3 प्रकार के मानसूनों से वर्षा होती है।

  1. बंगाल की खाड़ी का मानसून

यह मानसून राजस्थान में पूर्वी दिशा से प्रवेश करता है। पूर्वी दिशा से प्रवेश करने के कारण मानसूनी हवाओं को पूरवइयां के नाम से जाना जाता है यह मानसून राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा करवाता है इस मानसून से राजस्थान के उत्तरी, उत्तरी-पूर्वी, दक्षिणी-पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा

होती है।

  1. अरब सागर का मानसून

यह मानसून राजस्थान के दक्षिणी-पश्चिमी दिशा से प्रवेश करता है यह मानसून राजस्थान में अधिक वर्षा नहीं कर पाता क्योंकि यह अरावली पर्वतमाला के समान्तर निकल जाता है। राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का विस्तार दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व कि ओर है यदि

राज्य में अरावली का विस्तार उत्तरी-पश्चिमी से दक्षिणी-पूर्व कि ओर होता तो राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्र में वर्षा होती।

राजस्थान में सर्वप्रथम अरबसागर का मानसून प्रवेश करता है

  1. भूमध्यसागरीय मानसून

यह मानसून राजस्थान में पश्चिमी दिशा से प्रवेश करता है। पश्चिमी दिशा से प्रवेश करने के कारण इस मानसून को पश्चिमी विक्षोभों का मानसून के उपनाम से जाना जाता है। इस मानसून से राजस्थान में उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में वर्षा होती है। यह मानसून मुख्यतः सर्दीयों में

वर्षा करता है सर्दियों में होने वाली वर्षा को स्थानीय भाषा में मावठ कहते हैं यह वर्षा गेहुं की फसल के लिए सर्वाधिक लाभदायक होती है। इन वर्षा कि बूदों को गोल्डन ड्रोप्स या सोने कि बुंद के उप नाम से जाना जाता है।

🎯शीत ऋतु

राजस्थान में नम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु होती है। इन चार महीनों में जनवरी माह में सर्वाधिक सर्दी पड़ती है।शीत ऋतु में भूमध्यसागर में उठने वाले चक्रवातों के कारण राजस्थान के उतरी पश्चिमी भाग में वर्षा होती है। जिसे “मावट/मावठ” कहा जाता है। यह वर्षा

माघ महीने में होती है। शीतकालीन वर्षा मावट को – गोल्डन ड्रोप (अमृत बूदे) भी कहा जाता है। यह रबी की फसल के लिए लाभदायक है।

राज्य में हवाएं प्राय पश्चिम और उतर-पश्चिम की ओर चलती है।

🎯वर्षा

राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा दक्षिणी-पश्चिमी मानसून हवाओं से होती है तथा दुसरा स्थान बंगाल की खाड़ी का मानसून, तीसरा स्थान अरबसागर के मानसून, अन्तिम स्थान भूमध्यसागर के मानसून का है।

🎯आंधियों के नाम

💥उत्तर की ओर से आने वाली – उत्तरा, उत्तराद, धरोड, धराऊ

💥दक्षिण की ओर से आने वाली – लकाऊ

💥पूर्व की ओर से आने वाली – पूरवईयां, पूरवाई, पूरवा, आगुणी

💥पश्चिम की ओर से आने वाली – पिछवाई, पच्छऊ, पिछवा, आथूणी।

💥अन्य

उत्तर-पूर्व के मध्य से – संजेरी

पूर्व-दक्षिण के मध्य से – चीर/चील

दक्षिण-पश्चिम के मध्य से – समंदरी/समुन्द्री

उत्तर-पश्चिम के मध्य से – सूर्या

🎯दैनिक गति/घुर्णन गति

पृथ्वी अपने अक्ष पर 23 1/2 डिग्री झुकी हुई है। यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व 1610 किमी./घण्टा की चाल से 23 घण्टे 56 मिनट और 4 सेकण्ड में एक चक्र पुरा करती है। इस गति को घुर्णन गति या दैनिक गति कहते हैं इसी के कारण दिन रात होते हैं।

🎯वार्षिक गति/परिक्रमण गति

पृथ्वी को सूर्य कि परिक्रमा करने में 365 दिन 5 घण्टे 48 मिनट 46 सैकण्ड लगते हैं इसे पृथ्वी की वार्षिक गति या परिक्रमण गति कहते हैं। इसमें लगने वाले समय को सौर वर्ष कहा जाता है। पृथ्वी पर ऋतु परिर्वतन, इसकी अक्ष पर झुके होने के कारण तथा सूर्य के

सापेक्ष इसकी स्थिति में परिवर्तन यानि वार्षिक गति के कारण होती है। वार्षिक गति के कारण पृथ्वी पर दिन रात छोटे बड़े होते हैं।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 मार्च एवम् 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं फलस्वरूप सम्पूर्ण पृथ्वी पर रात-दिन की अवधि बराबर होती है।

🎯घुर्णन गति&परिक्रमण गति

💥विषुव

जब सुर्य की किरणें भुमध्य रेखा प सीधी पड़ती है तो इस स्थिति को विषुव कहा जाता है। वर्ष में दो विषुव होते हैं।

21 मार्च को बसन्त विषुव तथा 23 सितम्बर को शरद विषुव होते हैं

💥आयन

23 1/2 उत्तरी अक्षांश से 23 1/2 दक्षिणी अक्षांश के मध्य का भु-भाग जहां वर्ष में कभी न कभी सुर्य की किरणें सीधी चमकती है आयन कहलाता है यह दो होते हैं।

उत्तरी आयन(उत्तरायण) – 0 अक्षांश से 23 1/2 उत्तरी अक्षांश के मध्य।

दक्षीण आयन(दक्षिणायन) – 0 अक्षांश से 23 1/2 दक्षिणी अक्षांश के मध्य।

💥आयनान्त

जहां आयन का अन्त होता है। यह दो होते हैं

उत्तरीआयन का अन्त(उत्तरयणान्त) – 23 1/2 उत्तरी अक्षांश/कर्क रेखा पर 21 जुन को उत्तरी आयन का अन्त होता है।

दक्षिणी आयन का अन्त – 23 1/2 दक्षिणी अक्षांश/मकर रेखा पर 22 दिसम्बर को दक्षिणाअन्त होता है।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 जून को कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् रहती है फलस्वरूप उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी एवम् ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सुर्य की किरणें तीरछी पड़ने के कारण दिन छोटे रातें बड़ी व शरद ऋतु होती है।

🎯तथ्य______

उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 21 जुन

दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 21 जुन

उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 21 जुन

दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 21 जुन

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर सुर्य की किरणें लम्बवत् रहती है फलस्वरूप दक्षिण गोलार्द्ध में दिन बड़े, रातें छोटी एवम् ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में सुर्य कि किरणें तीरछी पड़ने के कारण दिन छोटे, रातें बड़ी व शरद ऋतु होती

है।

🎯तथ्य______

दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 22 दिसम्बर

उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 22 दिसम्बर

दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 22 दिसम्बर

उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 22 दिसम्बर

🎯कटिबन्ध_______

कोई भी दो अक्षांश के मध्य का भु-भाग कटिबंध कहलाता है।

🎯गोर___

कोई भी दो देशान्तर के मध्य का भु-भाग गोर कहलाता है।

भारत दो कटिबन्धों में स्थित है।

उष्ण कटिबंध और शीतोष्ण कटिबंध

राजस्थान उष्ण कटिबंध के निकट वास्तव में उपोष्ण कटिबंध में स्थित है।

🎯मानसून____

मानसून शब्द की उत्पति अरबी भाषा के मौसिन शब्द से हुई है। जिसका शाब्दिक अर्थ ऋतु विशेष में हवाओं की दिशाएं होता है।

गीष्मकालीन/दक्षिणी पश्चिमी मानसून

गर्मियों में जब उत्तरी गोलार्द्ध में सूय्र की किरणें सीधी पड़ती है। तो यहां निम्न वायुदाब क्षेत्र बनता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सुर्य की किरणें तीरछी पड़ने के कारण शीत ऋतु होती है और वायुदाब उच्च रहता है। इसलिए हवाऐं दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध की ओर

चलती है।

भारत की स्थिति प्रायद्वीपीय होने के कारण दक्षिण पश्चिम से आने वाली यह मानसूनी पवनें दो शाखाओं में विभाजित हो जाती है।

  1. अरब सागरीय शाखा 2. बंगाल की खाड़ी शाखा

भारत में सर्वप्रथम मानसून की अरब सागरीय शाखा सक्रिय होती है। औसतन 1 जुन को मालाबार तट केरल पर ग्रीष्म कालीन मानसून की अरब सागरीय शाखा सक्रिय होती है।

🎯नोट_____

भारत में ग्रीष्म कालीन मानसून सर्वप्रथम अण्डमान निकोबार द्वीपसमुह(ग्रेट निकोबार, इंदिरा प्वांइट) पर सक्रिय होता है।

राजस्थान में सर्वप्रथम ग्रीष्मकालीन मानसून की अरब सागरीय शाखा ही सक्रिय होती है।

भारत एवम् राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा ग्रीष्मकालीन मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से होती है।

शीतकालीन मानसून से कोरोमण्डल तट तमिलनाडू में हि वर्षा होती है। शीतकालीन मानसून से सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला देश – चीन।

🎯तथ्य______

विश्व का सबसे गर्म स्थान – अल-अजीजिया(लिबिया) सहारा मरूस्थल

भारत का सबसे गर्म राज्य – राजस्थान

भारत का सबसे गर्म स्थान – फलौदी(जोधपुर)

राजस्थान का सबसे गर्म जिला – चुरू

राजस्थान का सबसे गर्म स्थान – फलौदी(जोधपुर)

विश्व का सबसे ठण्डा स्थान – बखोयांस(रूस)

भारत का सबसे ठण्डा राज्य – जम्मू-कश्मीर

भारता का सबसे ठण्डा स्थान – लोह(-46)

राजस्थान का सबसे ठण्डा जिला – चुरू

राजस्थान का सबसे ठण्डा स्थान – माउण्ट आबू(सिरोही)

विश्व का सबसे आर्द्र स्थान – मौसिनराम(मेघालय) भारत

भारत का सबसे आर्द्र राज्य – केरल

भारत का सबसे आर्द्र स्थान – मौसिनराम(मेघालय)

राजस्थान का सबसे आर्द्र जिला – झालावाड़

राजस्थान का सबसे आर्द्र स्थान – माउण्ट आबु

विश्व का सबसे वर्षा वाला स्थान – मोसिनराम(मेघालय)

भारत का सबसे वर्षा वाला स्थान – मोसिनराम(मेघालय)

भारत का सबसे वर्षा वाला राज्य – केरल

राजस्थान का सबसे वर्षा वाल स्थान – माउण्ट आबू

राजस्थान का सबसे वर्षा वाला जिला – झालावाड़

विश्व का सबसे शुष्क स्थान – बर्खौयांस

भारत का सबसे शुष्क राज्य – राजस्थान

भारत का सबसे शुष्क स्थान – लेह(जम्मु-कश्मीर)

राजस्थान का सबसे शुष्क जिला – जैसलमेर

राजस्थान का सबसे शुष्क स्थान – सम(जैसलमेर) और फलौद(जोधपुर)

विश्व में सबसे कम वर्षा वाला स्थान – बर्खौयांस

भारत में सबसे कम वर्षा वाला राज्य – पंजाब

भारत में सबसे कम वर्षा वाला स्थान – लेह

राजस्थान में सबसे कम वर्षा वाला जिला – जैसलमेर

राजस्थान में सबसे कम वर्षा वाला स्थान – सम(जैसलमेर)

भारत का सर्वाधिक तापान्तर वाला राज्य – राजस्थान

राजस्थान का सर्वाधिक तापान्तर वाला जिला(वार्षिक) – चुरू

राजस्थान का सर्वाधिक तापान्तर वाला जिला(दैनिक) – जैसलमेर

राजस्थान का वनस्पति रहित क्षेत्र – सम(जैसलमेर)

साइबेरिया ठण्डी हवा एवं हिमालय हिमपात के कारण राजस्थान में जो शीत लहर चलती है वह कहलाती है – जाड़ा

गर्मीयों में थार के मरूस्थल में चलने वाली गर्म पवनें – लू

राजस्थान में सर्वाधिक धुल भरी आधियां चलती है – गंगानर में

राजस्थान में पाला – दक्षिणी तथा दक्षिणी पूर्वी भागों में अधिक ठण्ड के कारण पाला पड़ता है।

दक्षिण राजस्थान में तेज हवाओं के साथ जो मुसलाधार वर्षा होती है – चक्रवाती वर्षा

राजस्थान में मानसून का प्रवेश द्वार – झालावाड़ और बांसवाड़ा

राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा की विषमता वाला जिला – बाड़मेर और जैसलमेर

राजस्थान में वर्षा की सबसे कम विषमता वाला जिला -बांसवाड़ा

21 जून को राजस्थान के किस जिले में सूर्य की किरणे सीधी पड़ती है

22 दिसम्बर को राजस्थान के किस जिले को सुर्य की किरणें तीरछी पड़ती है – श्री गंगानगर

राजस्थान की जलवायु है – उपोष्ण कटिबंधीय

🎯मावठ_____

सर्दीयों में पश्चिमी विक्षोभ/भुमध्य सागरिय विक्षोप के कारण भारत में उतरी मैदानी क्षेत्र में जो वर्षा होती है उसे मावठ कहते हैं।

मावठ का प्रमुख कारण – जेटस्ट्रीम

जेटस्ट्रीम – सम्पूर्ण पृथ्वी पर पश्चिम से पूर्व कि ओर क्षोभमण्डल में चलने वाली पवनें।

मावठ रबी की फसल के लिए अत्यन्त उपयोगी होती है। इसलिए इसे गोल्डन ड्राप्स या स्वर्णीम बुंदें कहा जाता है।

🎯महत्वपुर्ण तथ्य_____

नाॅर्वेस्टर – छोटा नागपुर का पठार पर ग्रीष्म काल में चलने वाली पवनें नाॅर्वेस्टर कहलाती है। यह बिहार एवं झारखण्ड राज्य को प्रभावित करती है।

जब नाॅर्वेस्टर पवनें पूर्व की ओर आगे बढ़ कर पश्चिम बंगाल राज्य में पहुंचती है तो इन्हें काल वैशाली कहा जाता है। तथा जब यही पवनें पूर्व की ओर आगे पहुंच कर असम राज्य में पहुंचती है तो यहां 50 सेमी. वर्षा होती है। यह वर्षा चाय की खेती के लिए अत्यंत

उपयोगी होती है इसलिए इसे चाय वर्षा या टी. शावर कहा जाता है।

मैंगो शावर – तमिलनाडू, केरल एवम् आन्ध्रप्रदेश राज्यों में मानसुन पूर्व जो वर्षा होती है जिससे यहां की आम की फसलें पकती है वह वर्षा मैंगो शाॅवर कहलाती है।

चैरी ब्लाॅस्म – कर्नाटक राज्य में मानसून पूर्व जो वर्षा होती है जो कि यहां की कहवा की फसल के लिए अत्यधिक उपयोगी होती है चैरी ब्लाॅस्म या फुलों की बौछार कहलाती है।

मानसून की विभंगता – मानसून के द्वारा किसी एक स्थान पर वर्षा हो जाने तथा उसी स्थान पर होने वाली अगली वर्षा के मध्य का समय अनिश्चित होता है उसे ही मानसून की विभंगता कहा जाता है।

मानसून का फटना – दक्षिण भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान केरल के मालाबार तट पर तेज हवाओं एवम् बिजली की चमक के साथ बादल की तेज गर्जना के साथ जो मानसून की प्रथम मुसलाधार वर्षा होती है उसे मानसून का फटना कहा जाता है।

वृष्टि प्रदेश एवं वृष्टि छाया प्रदेश वृष्टि प्रदेश एवं वृष्टि छाया प्रदेश

🎯अल-नीनो – यह एक मर्ग जल धारा है जो कि दक्षिण अमेरिका महाद्विप के पश्चिम में प्रशान्त महासागर में ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान सक्रिय होती है इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है। और भारत एवम् पड़ौसी देशों में अल्पवृष्टि एवम् सुखा की स्थिति

पैदा हो जाती है।

🎯ला-नीनो – यह एक ठण्डी जल धारा है जो कि आस्टेªलिया यह महाद्वीप के उत्तर-पूर्व में अल-नीनों के विपरित उत्पन्न होती है इससे भारतीय मानसून की शक्ति बढ़ जाती है और भारत तथा पड़ौसी देशों में अतिवृष्टि की स्थिति पैदा हो जाती है।

🎯उपसौर और अपसौर